वित्त वर्ष 2023-24 में भाजपा को मिला सबसे ज़्यादा चंदा: एडीआर रिपोर्ट
हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में देश की सत्तारूढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सबसे ज़्यादा चंदा मिला है। यह रिपोर्ट एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने जारी की है। इसमें बताया गया है कि इस अवधि में भाजपा को कुल 2,243.947 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जो सभी राष्ट्रीय पार्टियों को मिले कुल चंदे का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा है।
अन्य पार्टियों से कई गुना ज़्यादा मिला चंदा
एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा को मिला चंदा कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, नेशनल पीपुल्स पार्टी और सीपीआई (एम) जैसी अन्य प्रमुख पार्टियों को मिले कुल चंदे से छह गुना ज़्यादा है। इस रिपोर्ट से साफ होता है कि राजनीतिक फंडिंग के मामले में भाजपा बाकी दलों से बहुत आगे है। इस तरह की आर्थिक ताकत चुनावों में पार्टी की गतिविधियों और प्रचार-प्रसार में बड़ी भूमिका निभाती है।
चंदे का मुख्य स्रोत: इलेक्टोरल बॉन्ड
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अधिकतर चंदा इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिला है। इलेक्टोरल बॉन्ड एक ऐसा माध्यम है जिससे लोग और कंपनियां गुप्त रूप से राजनीतिक दलों को पैसा दे सकते हैं। यह व्यवस्था पहले पारदर्शिता लाने के नाम पर शुरू की गई थी, लेकिन अब इसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं क्योंकि इससे यह पता लगाना मुश्किल हो गया है कि किसने किस पार्टी को कितना चंदा दिया।
अन्य पार्टियों की स्थिति
कांग्रेस पार्टी को इस दौरान कुल 235.66 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जबकि आम आदमी पार्टी को लगभग 85 करोड़ रुपये मिले। इसके मुकाबले भाजपा को छह गुना से भी अधिक राशि मिली है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) और नेशनल पीपुल्स पार्टी को इससे कहीं कम चंदा मिला।
राजनीतिक फंडिंग पर उठते सवाल
इतने बड़े अंतर ने राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एक ही पार्टी को इतनी बड़ी राशि मिलने से राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इससे चुनावों में बराबरी की टक्कर मुश्किल हो जाती है, क्योंकि एक पार्टी के पास प्रचार के लिए अधिक संसाधन होते हैं।
एडीआर की यह रिपोर्ट दिखाती है कि भारतीय राजनीति में चंदा और पैसे की भूमिका कितनी अहम हो चुकी है। जब एक ही पार्टी को कुल चंदे का 88 फीसदी हिस्सा मिले, तो लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा की भावना कमजोर हो सकती है। यह जरूरी है कि राजनीतिक फंडिंग की प्रक्रिया को पारदर्शी और संतुलित बनाया जाए ताकि सभी दलों को समान अवसर मिल सके और लोकतंत्र की बुनियाद मजबूत हो।
